
[नर्मदापुरम संवाददाता]
जिला चिकित्सालय नर्मदापुरम की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। इस बार मामला मरणोपरांत नेत्रदान जैसी अत्यंत संवेदनशील प्रक्रिया से जुड़ा है। माखननगर निवासी स्वर्गीय राजेंद्र भट्ट (64), जो पूर्व खंड चिकित्सा अधिकारी डॉ. शोभना चौकसे भट्ट के पति थे, का सोमवार सुबह हृदयाघात से निधन हो गया। उन्होंने जीवनकाल में मरणोपरांत नेत्रदान की इच्छा व्यक्त की थी, लेकिन परिजनों का आरोप है कि जिला अस्पताल के नेत्र विभाग की उदासीनता के कारण उनकी अंतिम इच्छा समय पर पूरी नहीं हो सकी। अंततः परिवार को निजी खर्च पर भोपाल से विशेषज्ञ चिकित्सकों की टीम बुलानी पड़ी।
परिजनों के अनुसार, निधन के तुरंत बाद उन्होंने जिला अस्पताल के नेत्र विभाग से संपर्क कर नेत्रदान की प्रक्रिया पूरी कराने का अनुरोध किया। आरोप है कि उन्हें समय पर न तो स्पष्ट मार्गदर्शन मिला और न ही स्थानीय स्तर पर आवश्यक व्यवस्था उपलब्ध कराई गई। जबकि जिला चिकित्सालय में नेत्र रोग विशेषज्ञ एवं नेत्र सर्जन पदस्थ हैं, इसके बावजूद प्रक्रिया स्थानीय स्तर पर संपन्न नहीं हो सकी। मजबूरन परिवार ने भोपाल स्थित सेवा सदन नेत्र अस्पताल, बैरागढ़ से विशेषज्ञ टीम बुलवाई। टीम के नर्मदापुरम पहुंचने के बाद ही नेत्रदान की प्रक्रिया पूरी हो सकी।
विशेषज्ञ टीम के आने में समय लगने के कारण अंतिम संस्कार भी निर्धारित समय पर नहीं हो पाया। प्रक्रिया पूरी होने तक परिजनों और रिश्तेदारों को इंतजार करना पड़ा। इस दौरान परिवार ने अस्पताल प्रबंधन के प्रति नाराजगी जताते हुए कहा कि यदि स्थानीय स्तर पर समय रहते सहयोग और आवश्यक व्यवस्था मिल जाती, तो नेत्रदान की प्रक्रिया बिना किसी विलंब के पूरी हो सकती थी।
पूर्व खंड चिकित्सा अधिकारी डॉ. शोभना चौकसे भट्ट ने कहा कि मरणोपरांत नेत्रदान और देहदान समाज के लिए अत्यंत प्रेरणादायक कार्य हैं। इससे किसी जरूरतमंद को नई रोशनी मिल सकती है। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन का संवेदनशील एवं त्वरित सहयोग आवश्यक है, ताकि अधिक से अधिक लोग इस पुनीत कार्य के लिए आगे आने के लिए प्रेरित हों।
घटना के बाद स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है। उनका कहना है कि जब जिला अस्पताल में नेत्र विशेषज्ञ उपलब्ध हैं, तो नेत्रदान की प्रक्रिया स्थानीय स्तर पर क्यों नहीं हो सकी। साथ ही भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न बने, इसके लिए स्पष्ट प्रोटोकॉल, आवश्यक संसाधनों की उपलब्धता और जिम्मेदारी तय करने की मांग भी उठाई गई है।
फिलहाल, इस मामले में जिला अस्पताल प्रबंधन का आधिकारिक पक्ष सामने नहीं आया है।
